तेज़ होगी दलित ईसाई की सामाजिक बराबरी की लड़ाई

कई दशकों से दलित ईसाई चीख-चीख कर कह रहे थे कि वह छुआछुत और जातिगत-भेदभाव के शिकार हैं मगर अब कैथोलिक समुदाय की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था ‘इंडियन कैथोलिक ईसाई चर्च’ ने भी इस “संगीन गुनाह” को क़बूल कर लिया है।

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हिन्दू कोड बिल पर चुप्पी साधकर भाजपा कर रही ट्रिपल तलाक की राजनीति

भाजपा को उमीद है कि इस प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में होने वाले चुनाव के दौरान वह फायदा उठा पायेगी, क्योंकि तीन-तलाक और समान नागरिक संहिता का मसला उनकी सोच में ‘हिन्दू’ वोटरों को लामबंद करने का एक आसान जरिया साबित हो सकता है.

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मेरे अल्लाह मेरी दुआ सुनना : अरावली हिल्स पर पथराई आँखों की पुकार

पिछले एक महीने से पुलिस पचास हजार की रकम से दो लाख रुपये तक की रकम की घोषणा कर चुकी है, नजीब का पता बताने के लिए ,लेकिन अंतिम बार नजीब की पिटाई करने वाले छात्रों से एक सवाल पूछना भी मुनासिब नहीं समझती. जेएनयू से गायब नजीब की मां दिल्ली की सड़कों पर बेटे को पथराई आँखों से ढूंढ रही हैं…

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गाँधी, गौरक्षा और हिन्दू पहचान

“उदारवादी-प्रगतिशील” बुद्धिजीवियों का बड़ा तबका, गांधीवाद से इतना गहरे तक प्रभावित है कि वह इस प्रश्न पर निरपेक्षता से विचार कर ही नहीं सकता कि क्या गाँधी ने ‘पवित्र गाय’ के विमर्श को केंद्र में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी

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जेएनयू चुनाव : ‘ब्राह्मण छोकरों की टोली’ को चुनौती दे रहा रिक्शाचालक का बेटा

बीएपीएसए के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार सोनपिम्पले राहुल पूनाराम हमेशा से कहते आये हैं कि दमन के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व दमितों को ही करना होगा। अभय कुमार के साथ इस साक्षात्कार में वे इसी बात पर जोर दे रहे हैं

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पूरी रात जागने वाला गंगा ढाबा हमेशा के लिए सो जाएगा ?

जेएनयू में प्रवेश करते ही जो जगह हमारा सबसे पहले इस्तेकबाल करती है और शायद सबसे ज्यादा आकर्षित करती है वह गंगा ढाबा है. मगर क्या यह रौनक और चहल-पहल अगले दिन भी जारी रहेगा यह यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता.

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“पवित्र गाय” से जुड़े कुछ “अपवित्र” सवाल

अफ़सोस की बात हैं कि आजादी के बाद भी गायरक्षा के नाम पर सियासत ख़त्म नहीं हुई। यह उसी ब्रह्मणवादी सोच का परिणाम है कि संविधान के नीति-निर्देशक तत्व में गाय जैसे जानवर की हत्या पर रोक लगाने की बात कही गई है। मुझे इसमें कोई हिचक नहीं है कि इस तरह की ब्रह्मणवादी नीतियों के पीछे गांधीवादी विचार था, जो गायरक्षा को हिंदू धर्म का कर्तव्य मानते थे

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पहले बहुजन, फिर मुसलमान

अन्य दलितों और पिछड़ों के साथ एकजुट होकर और नए नायकों को अपनाकर पसमांदा, श्रेष्ठि वर्ग की जातिवादी अल्पसंख्यक राजनीति के चंगुल से मुक्त हो गए हैं

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‘अंदाजिय़ा आंकड़ेबाज़ी से उपजता है खतरनाक जातिवाद’

प्रोफेसर अमिताभ कुंडू कहते हैं कि हमारे देश में पिछली जाति जनगणना लगभग एक सदी पहले हुई थी। अब समय आ गया है कि सरकार अपने कार्यक्रमों और विभिन्न समुदायों के लिए कोटे का निर्धारण ताजे विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर करे

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