शिक्षा ही स्त्री का गहना है : सावित्रीबाई फुले

फुले दम्पत्ति के अलावा 19वीं सदी में शायद कोई ऐसी दूसरी शख्सियतें होगीं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी वंचित समाज की शिक्षा और उत्थान के लिए लगाया हो। ज़ात-पात, अछूत प्रथा, ब्राह्मणवाद, अंधविश्वास, महिलाओं की दुर्दशा, किसानों और मजदूरों के शोषण के खिलाफ़ आधुनिक भारत में सावित्रीबाई फुले ने प्रखर तरीके से आवाज उठाया। सावित्रीबाई की इस …

फुले दम्पत्ति के अलावा 19वीं सदी में शायद कोई ऐसी दूसरी शख्सियतें होगीं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी वंचित समाज की शिक्षा और उत्थान के लिए लगाया हो। ज़ात-पात, अछूत प्रथा, ब्राह्मणवाद, अंधविश्वास, महिलाओं की दुर्दशा, किसानों और मजदूरों के शोषण के खिलाफ़ आधुनिक भारत में सावित्रीबाई फुले ने प्रखर तरीके से आवाज उठाया। सावित्रीबाई की इस लड़ाई में उनके जीवनसाथी महात्मा जोतीराव फुले (1827-1890) बराबर के शरीक थे, जिनसे उनकी नौ साल की उम्र में शादी हो गई थी। संघर्ष के हर मोड़ पर दोनों साथ-साथ रहे। अपनी ज़िन्दगी में जोतीराव फुले आगमन पर ख़ुशी का इज़हार करते हुए, सावित्रीबाई ने अपनी कविता ‘संसार की राह में’ कहा : “मेरे जीवन में जोतीराव तुम आए ऐसे/जैसे पराग फूलों में/शहद, फूलों की कलियों में”।

जब औरतों को शिक्षा से अक्सर मह़रूम रखा जाता था, तब जोतीराव फुले ने सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया। फुले-दम्पति ने पूरी ज़िन्दगी इस बात पर ज़ोर दिया कि शिक्षा सब के लिए, खासकर शूद्र और अतिशूद्र, के लिए ज़रूरी है। बाबासाहेब आंबेडकर ने भी फुले-दम्पति के जीवन और विचारों से प्रेरणा ली और जोतीराव फुले को अपना गुरु माना।

सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी, 1831 को बॉम्बे प्रेसीडेंसी के नायगांव में हुआ था, जबकि उनकी मृत्यु 10 मार्च, 1897 को हुई। उस ज़माने में भी बहुत सारे लोग समाज-सुधार के पैरोकार थे, मगर किसी ने भी रूढ़िवादिता, दकियानुसी विचारों, अंधविश्वास, अछूत प्रथा, शोषण, ब्राह्मणवाद के खिलाफ उस तरह मुख़ालफ़त नहीं की, जैसा फुले-दम्पति ने किया। दोनों ने मुक्ति की बात सिर्फ भाषणों तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे कर के भी दिखाया। आख़िरी साँस तक, सावित्रीबाई प्लेग जैसी घातक महामारी से प्रभावित लोगों की सेवा करती रहीं। अफ़सोस की बात है आज भी बहुत सारे लोग उनकी कार्यों और विचारों से अनभिज्ञ हैं। इसके मूल में दो कारण हैं। पहला, देश का ब्राह्मणवादी सत्ता-वर्ग फुले-दम्पत्ति के विचारों को अपने शोषणकारी-तंत्र के ख़िलाफ़ समझता है, और इसे दबाने की पूरी कोशिश करता है। दूसरा, उनकी रचनाओं विभिन्न भाषाओं में अनुवाद मौजूद नहीं है, जो इनके प्रचार-प्रसार में बड़ी रुकावट है।

अन्याय और शोषण को कैसे ख़त्म किया जाए? इस सवाल ने दुनिया के तमाम बड़ी और क्रान्तिकारी हस्तियों को परेशान किया है। इस सवाल से फुले-दम्पति और उनके समकालीन कार्ल मार्क्स भी जूझे। यह कैसा इत्तेफ़ाक़ था कि जब साल 1848 में कार्ल मार्क्स यूरोप में ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ लिखने में व्यस्त थे, उसी दौरान इधर भारत में फुले-दम्पति ने शुद्र और अतिशूद्र महिलाओं के लिए स्कूल खोला और कहा कि शिक्षा की धार से ग़ुलामी की जंज़ीर कट सकती है। उनके द्वारा शूद्र और अतिशूद्र (जिनको हज़ारों सालों से शिक्षा से वंचित रखा गया था) के लिए स्कूल खोलना एक क्रांतिकारी क़दम था। आगे के सालों में इस तरह के और भी स्कूल खोले गए और वहां पढ़ने वालों में सब शामिल थे, जैसे महिलाएं, दलित, पिछड़े इत्यादि। फुले दम्पत्ति के इन कामो में फ़ातिमा शेख भी शामिल थीं, जो दलितों, पिछड़ों, और मुसलमानों के गहरे सम्बन्ध की तरफ़ इशारा करता है। जोतीराव फुले ब्राह्मणवादी तंत्र से इस तरह क्षुब्ध थे कि

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