सावित्रीबाई फुले: नारीमुक्ति की अग्रणी योद्धा

सावित्रीबाई फुले रचना समग्र में सावित्रीबाई (1831-1897) की कविताएं, पत्र और भाषण शामिल हैं, जो जाति-प्रथा, अंधविश्वास, और समाज में महिला की गुलामी के खिलाफ तगड़ा विरोध दर्ज कराते हैं.

सवित्रीबाई फुले रचना समग्र की संपादक रजनी तिलक हैं. अनुवादक शेखर पवार हैं. किताब की कीमत 160 रुपए है. प्रकाशक है, मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशंस.

सावित्रीबाई फुले रचना समग्र में सावित्रीबाई (1831-1897) की कविताएं, पत्र और भाषण शामिल हैं, जो जाति-प्रथा, अंधविश्वास, और समाज में महिला की गुलामी के खिलाफ तगड़ा विरोध दर्ज कराते हैं. यह किताब दरअसल फुले पर आई मराठी रचना का हिंदी अनुवाद है.

सवित्रीबाई फुले रचना समग्र की संपादक रजनी तिलक हैं. अनुवादक शेखर पवार हैं. किताब की कीमत 160 रुपए है. प्रकाशक है, मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशंस.

सावित्रीबाई फुले रचना समग्र में सावित्रीबाई (1831-1897) की कविताएं, पत्र और भाषण शामिल हैं, जो जाति-प्रथा, अंधविश्वास, और समाज में महिला की गुलामी के खिलाफ तगड़ा विरोध दर्ज कराते हैं. यह किताब दरअसल फुले पर आई मराठी रचना का हिंदी अनुवाद है.
उम्मीद है कि यह हिंदीपट्टी को सावित्रीबाई के विचारों से अवगत कराने में मददगार साबित होगी. उन्होंने ज्योतिबा फुले (1827-1890) से शादी की, जो माली (शूद्र) थे और जिन्होंने आधुनिक भारत में जात-पात विरोधी लड़ाई की अगुआई की. आगे चलकर बाबासाहेब आंबेडकर (1891-1956) ने इसी लड़ाई को आगे बढ़ाया. फुले दंपती ने पूरी जिंदगी जाति-प्रथा, छुआछूत, अंधविश्वास, श्रमिक शूद्रों और अति-शूद्रों के ऊपर हो रहे शोषण और महिलाओं की दुर्दशा के खिलाफ आवाज उठाई. सावित्रीबाई इसमें बराबर की भागीदार रहीं.

समाज से शोषण खत्म करने के लिए कार्ल माक्स्र जब यूरोप में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो लिखने में व्यस्त थे, तब फुले दंपती भारत में महिलाओं की शिक्षा के जरिए शोषण-मुक्त समाज का निर्माण कर रहे थे. उन्होंने शूद्र और अति-शूद्र लड़कियों के लिए स्कूल खोला. सदियों से शिक्षा से वंचित रखे गए निचली जाति के लोगों के लिए यह एक इंकलाबी कदम था.

आगे चलकर ऐसे स्कूल अन्य जातियों की महिलाओं और श्रमिक वर्ग के लिए भी खोले गए. शूद्रों, अति-शूद्रों और महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में काम करने की वजह से इस दंपती को प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणों से जबरदस्त विरोध झेलना पड़ा. जानलेवा हमला तक हुआ. मगर इस मुखालफत ने उनके अज्म को और बुलंद कर दिया. धीरे-धीरे बहुत-से लोगों ने सोच बदली और उन्होंने बेटियों को उनके स्कूल भेजना शुरू किया.

सार यह है कि सावित्रीबाई के नजदीक शिक्षा का मार्ग नारी मुक्ति की तरफ ले जाता है. यह बात उनकी रचना में मौजूद है. मसलन, संगीत नाटिका कविता में सावित्रीबाई कहती हैं: ”स्वाभिमान से जीने हेतु बेटियों पढ़ो-लिखो खूब पढ़ो/पाठशाला रोज जाकर नित अपना ज्ञान बढ़ाओ/हर इनसान का सच्चा आभूषण शिक्षा है.

हर स्त्री को शिक्षा का गहना पहनना है… (पृ. 74).” शिक्षा के अलावा, उन्होंने विधवा-उत्थान और पुनर्विवाह के लिए भी काम किया. उन्होंने काशीबाई नामक ब्राह्मण विधवा से हुए बच्चे को गोद लेकर पढ़ाया-लिखाया, डॉक्टर बनाया और बाद में उसका अंतर-जातीय विवाह भी करवाया. ऐसे क्रांतिकारी काम आज से 150 साल पूर्व! जबकि हमारा समाज आज भी महिला दमन, दहेज, जात-पात से जूझ रहा है. इन्हीं वजहों से सावित्रीबाई की रचना हमारे लिए काफी अहम् हो जाती है. उम्मीद है कि हिंदी-पाठक इस किताब को पढ़कर सावित्रीबाई के विचार से आशना होंगे और उनके अधूरे सपनों को मंजिल तक पहुंचाने में अपना योगदान करेंगे.

(First Published in India Today, Hindi.)

 

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of

Related Post

कांशीराम आमजनों के नेता

२०वीं सदी के बहुत कम नेता हैं, जिन्होंने भारतीय राजनीति को इतना प्रभावित किया, जितना कि कांशीराम ने। वे सच्चे अर्थों में जननेता थे। पंजाब के एक गांव में रामदासिया…
Read More

आत्मानुभव की कोख से उपजा लेखन

लेखक और साहित्यिक सिद्धांतकार शरणकुमार लिम्बाले (टूवड्र्स एन एस्थेटिक ऑफ दलित लिटरेचर: हिस्ट्री, 2004), दलित साहित्य को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि ‘यह वह साहित्य है, जो दलितों के…
Read More