बुनियादी सुधार की जरूरत

उच्च शिक्षा की दिशा बेहतर हो इसके लिए जरूरी है कि छात्रों को छात्रवृत्ति सहित तमाम बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं न कि छात्रों पर प्रशासन अपना फैसला थोपता रहे

देश में उच्च-शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए जरूरत इस बात की है कि छात्रों के लिए छात्रवृत्ति और सुविधाएं बढ़ाई जाएं। ज्यादा से ज्यादा छात्रों को शिक्षण संस्थाओं में जगह देने के लिए और भी कॉलेज, विश्वविद्यालय खोले जाएं। मगर अफसोस है कि प्रशासन इस दिशा में काम करने के बजाय छात्रों को ‘अनुशासित’ करने में अपनी ऊर्जा व्यर्थ खर्च कर रहा है, जो न सिर्फ गतिरोध पैदा करता है, बल्कि इससे शिक्षा का ही सब से ज्यादा नुकसान होता है। कुछ ऐसा ही प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में आजकल देखने को मिल रहा है।

शीतकालीन सत्र को शुरू हुए एक महीन गुजर गया है, मगर जेएनयू में पठन-पाठन अब भी बुरी तरह से बाधित है। हजारों की तादाद में छात्र अनिवार्य हाजरी यानी ‘कम्पलसरी अटेंडेंस’ के विरोध में उतर आए हैं। विरोध करने वालों में सभी छात्र संगठन-वामपंथी, उदारवादी और दक्षिणपंथी-शामिल हैं। सबकी यही मांग है कि प्रशासन इस छात्र-विरोधी ‘फरमान’ को फौरन वापस ले, क्योंकि जेएनयू में गैर-हाजरी कभी समस्या रही ही नहीं है। ज्ञात रहे कि जेएनयू प्रशासन ने सब से पहले 22 दिसंबर 2017 को एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें कहा गया कि ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट छात्र ही नहीं, बल्कि एमफिल और पीएचडी शोधार्थी को भी अपनी लाजमी हाजरी देनी होगी। प्रशासन इस सकरुलर को लेकर अड़ा हुआ है और उसे हजारों छात्रों का विरोध-प्रदर्शन कुछ छात्रों की ‘कारस्तानी’ दिख रही है। उनकी नजर में यह सब कैंपस के अकादमिक काम-काज में ‘खलल’ डाल रहा है। दुर्भाग्य देखिए कि छात्रों की समस्या सुनने और उनसे बात-चीत शुरू करने के बजाय प्रशासन ने फिर से एक नया सकरुलर जारी किया है, जिसमें उसने छात्रों को धमकी दी है कि अगर उन्होंने हाजिरी का विरोध किया तो उन्हें हॉस्टल से बाहर कर दिया जाएगा, उनकी स्कॉलरशिप रोक दी जाएगी और उन्हें चिकित्सा जैसी मौलिक सुविधा से भी वंचित कर दिया जाएगा।

विडंबना देखिए कि यह सबकुछ प्रशासन ‘छात्र-हित’ के लिए जरूरी बता रहा है। उसकी दलील है कि अनिवार्य हाजिरी ‘ड्राप-आउट’ की समस्या को खत्म करेगी और पीएचडी जल्द पूरा होने में मददगार साबित होगी। मगर प्रशासन को यह नहीं भूलना चाहिए कि अपनी बात को आगे रख सकता है, अपनी बात को किसी पर थोप नहीं सकता। अगर वह ड्राप-आउट की समस्या से ‘चिंतित’ है, तो वह इसपर विमर्श करने से क्यों कतरा रहा है? क्यों प्रशासन अभी तक छात्र-संघ और शिक्षक-संघ से बात करने से ङिाझक रहा है?

पहले भी प्रशासन ने कई विवादित फैसले लिए और उसे कैंपस पर थोपा। जैसे, छात्रवृत्ति की संख्या कम करना, एमफिल, पीएचडी की सीटों में जबर्दस्त कटौती करना, विश्वविद्यालय परिसर में टैंक लाने के लिए सरकार से अपील करना इत्यादि। इस बार भी प्रशासन छात्रों का पक्ष सुनने को तैयार नहीं है, जिसकी भलाई के नाम पर वह अपने हर फैसले को जायज ठहरा रहा है। बहुत सारे शोधार्थी सवाल उठा रहे हैं कि अगर जबरन अनिवार्य उपस्थिति के लिए उन्हें बाध्य किया जाएगा तो कब वे ‘फिल्ड वर्क’ करेंगे? या फिर वे बाहर के पुस्तकालय और लेखागार के लिए कब जा पाएंगे? यदि यह फरमान वापस नहीं लिया जाता तो यह जेएनयू के आजाद और प्रगतिशील किरदार पर बड़ा हमला होगा। इससे कौन इन्कार कर सकता है कि खौफ और पहरे के माहौल में आलोचनावादी विमर्श की गुंजाइश न के बराबर हो जाती है। ‘राष्ट्रीयता’ की दुहाई देने वाले यह भूल जाते है कि राष्ट्रकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था जहां ‘सोच पर पहरा न हो’ और ज्ञान को किसी बंधन में न बांधा जाए।1अगर प्रशासन को लगता है कि अनिवार्य हाजिरी से रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा, तो क्या वह इसे वैज्ञानिक तथ्य से साबित कर सकता है? क्या वह कोई ऐसा रिसर्च का हवाला दे सकते है, जो यह साबित करे कि अनिवार्य उपस्थिति से रिसर्च की गुणवता में सुधार होता है? क्या लाजमी हाजिरी ने छात्रों की विषय में रुचि बढ़ाने में कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है? जब शिक्षाविद ‘ओपेन’ लनिर्ंग और ‘परीक्षा व ग्रेड’ मुक्त शिक्षा की बात कर रहे हैं, वहीं जेएनयू प्रशासन इस दिशा में पहल करने के बजाय विपरीत दिशा में दौड़ रहा है!

प्रशासन को यह मालूम होना चाहिए कि नीलाद्री भट्टाचार्य, अभिजित पाठक, निवेदिता मेनन, गोपाल गुरु, उत्सा पटनायक, प्रभात पटनायक जैसे जेएनयू प्रोफेसर इतने लोकप्रिय हैं कि उनके क्लास में बड़ी तादाद में छात्र पहुंचते हैं। जेएनयू आने से पहले ही मैं भी इन शिक्षकों के बारे में सुन चुका था। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हमारे सीनियर इनके लेर सुनने के लिए जेएनयू आते थे। शिक्षकों के हाथ में हमने हमेशा किताबें देखीं, लेकिन उन्हें अटैंडेंस-शीट लेने को दबाव डाला जा रहा है।

जेएनयू में पहले से ही छात्रों को विभिन्न विषयों में कोर्स लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है। तभी तो छात्र कई बार आवश्यकता से अधिक कोर्सेज को ‘क्रेडिट’ और ‘ऑडिट’ करते हैं। वे जानते हैं कि एक विषय दूसरे विषय के अध्ययन के बगैर अधूरा है। पाठ्यम को पूरा करने के लिए शिक्षक अपनी तरफ से अतिरिक्त क्लासेज भी लेते हैं। सभी शिक्षक तन्यमता से अपना काम करते हैं। क्योंकि वे ज्ञान और रिसर्च के महत्व को बखूबी समझते हैं।

यह सब अब तक बिना अनिवार्य हाजिरी के चलता आ रहा है। सरकार को भी इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। जैसा कि शिक्षाविदों का मानना है कि शिक्षण संस्थानों के अंदर प्रशासन की भूमिका बेहद ही सीमित होनी चाहिए। जेएनयू में भी प्रशासन, अपने फैसला सब पर न थोपे। हमें जेएनयू जैसी और संस्था बनाने की जरूरत है। इसे गतिरोध और टकराव के भंवर से बचाना होगा।

First published in Dainik Jagran (National Edition), February 14, 2018, p. 9.

You may also download the article

 

 

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of

Related Post

जेएनयू को विश्वविद्यालय से स्कूल बनाने की तैयारी

  शीतकालीन सत्र से जेएनयू के सभी छात्रों को “अनिवार्य” हाजरी देनी होगी। जेएनयू प्रशासन ने 22 दिसम्बर के रोज़ एक सर्कुलर जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि स्नातक, स्नातकोतर छात्रों ही नहीं, बल्कि एमफिल और पीएचडी…
Read More

बेजा बहस का सिलसिला

      First published in Dainik Jagran, National Edition, July 29, 2017, p. 9.
Read More

जेएनयू चुनाव : ‘ब्राह्मण छोकरों की टोली’ को चुनौती दे रहा रिक्शाचालक का बेटा

जेनएनयू छात्रसंघ (जेएनयूएसयू) के चुनाव जल्द ही होने वाले हैं और विशाल जेएनयू कैम्पस में राजनीतिक गर्मागर्मी अपने चरम पर है। नौ फरवरी की घटना के मद्देनजर, 9 सितंबर को…
Read More

पूरी रात जागने वाला गंगा ढाबा हमेशा के लिए सो जाएगा ?

जेएनयू में प्रवेश करते ही जो जगह हमारा सबसे पहले इस्तेकबाल करती है और शायद सबसे ज्यादा आकर्षित करती है वह गंगा ढाबा है. कल रात भी बदस्तूर गंगा ढ़ाबा…
Read More