बाथे की नजर से बिहार चुनाव

दलितों और पिछड़ों ने ऊँची जातियों के हाथों बहुत कुछ भोगा है परंतु वोट के मामले में वे अब भी बंटे हुए हैं

लक्ष्मणपुर बाथे कितनी दूर है?’’ मैंने कार की खिड़की से सिर निकालकर पटना से 85 किलोमीटर दूर अरवल के ओलीदार बाजार में खड़े कुछ लोगों से पूछा। एक बूढ़े आदमी, जिसके माथे पर लंबा-सा तिलक लगा था और हाथों में एक झोला था, ने जवाब दिया, ”ज्यादा दूर नहीं है। अगर तुम मुझे गाड़ी में बिठा लो तो मैं तुम्हें वहां ले चलूंगा।’’ लक्ष्मणपुर बाथे या केवल बाथे, सोन नदी के किनारे एक छोटा सा गांव है जो सन् 1997 की सर्दियों में, तब राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था, जब एक ही रात में वहां दलित और पिछड़ी जाति के 58 लोगों की कथित तौर पर ऊँची जातियों के भूमिहारों की रणवीर सेना के हथियारबंद गुर्गों ने हत्या कर दी थी। जब बूढ़ा आदमी कार में बैठ रहा था, तभी एक लड़के ने मुझसे पूछा कि क्या वह भी हमारे साथ चल सकता है। और मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर मेरे बगल में बैठ गया। बुजुर्गवार ने अपना परिचय सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक और तांत्रिक केदारनाथ भारती के रूप में दिया। उन्होंने कुछ संस्कृत श्लोक सुनाए, जिससे वह लड़का काफी प्रभावित नजर आया। उसने तांत्रिक महोदय से कहा कि वह रांची विश्वविद्यालय से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक है और कई साक्षात्कार देने के बाद भी उसे अभी तक नौकरी नहीं मिल सकी है। वह चाहता था कि तांत्रिक नौकरी दिलाने में उसकी मदद करें। भारती ने उसे तुरंत एक अगूंठी पकड़ाई और आश्वासन दिया कि उसे अगली लक्ष्मी पूजा तक निश्चित ही कोई न कोई नौकरी मिल जाएगी। लड़के ने श्रद्धापूर्वक अंगूठी ग्रहण की और बूढ़े आदमी की 51 रूपये की दक्षिणा की मांग को तत्काल पूरा किया।

इस बीच, हम परासी बाजार पहुंच गए। दोनों कार से उतरे और एक संकरी, सर्पीली सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा ”यह सड़क तुम्हें सीधे बाथे ले जाएगी। यहां से बाथे दो किलोमीटर से भी कम दूर है।’’

कुछ ही मिनटों बाद मैं बाथे गांव में था, जो अमरा से नवादा जाने वाली नहर के किनारे बसा है। चूंकि नहर की कई सालों से सफाई नहीं हुई थी इसलिए वह ऊँची घास से पूरी तरह ढंकी हुई थी। ”यह नहर हमारे लिए किसी काम की नहीं है। मुझे याद नहीं कि आखिरी बार कब मैंने इसमें पानी बहते देखा था’’, विजय चौधरी ने कहा। मल्लाह जाति के चौधरी की आमदनी का मुख्य स्त्रोत वे मछलियां हैं, जिन्हें वह सोन नदी से पकड़ते हैं। किसानों को सिंचाई के लिए कुओं पर निर्भर रहना पड़ता है और सबकी इतनी हैसियत नहीं कि कुएं खुदवा सकें। बाथे में बिजली नहीं है। ”सभी उम्मीदवार हमें यह आश्वासन देते आए हैं कि अगर वे चुने गए तो गांव में बिजली लाएंगे परंतु किसी ने अपना वायदा पूरा नहीं किया’’, चैधरी ने कहा। उनकी आवाज में कुंठा और गुस्सा साफ झलक रहा था।

जैसे ही मैं बाथे की मुख्य बसाहट में घुसा, मुझे यह तुरंत समझ में आ गया कि कौनसे घर ऊँची जातियों के हैं और कौन से अन्यों के। ऊँची जातियों के बड़े, पक्के घर हैं, जिनके आसपास काफी खुली जगह है। दलितों और नीची जातियों के लोगों के घर छोटे हैं। उनमें से कुछ पक्के और कुछ कच्चे हैं। गांववालों ने मुझे बताया कि अधिकांश दलितों के पास खुद की जमीनें नहीं हैं और जिनके पास हैं भी, उनकी कुल जमीन पांच कठ्ठे से ज्यादा नहीं है। गांव के ऊँची जाति के लोगों में भूमिहारों और राजपूतों की बहुलता है। कुछ घर ब्राह्मणों के भी हैं। बहुसंख्यक निवासी दलित, चौधरी-मल्लाह और अन्य पिछड़ी जातियों के हैं। दलितों में रविदास (चमार), पासवान, राजबंसी, बैठा (धोबी) और पासी शामिल हैं।

पचास वर्षीय भुवनेश्वर राम के अनुसार, रविदासों, पासवानों, राजबंसियों, बैठों और पासियो की बाथे में आबादी क्रमश: 350, 150, 150, 20 व 10 है। दलित, ऊँची जातियां और ओबीसी मिलाकर गांव की कुल आबादी 2200 है।

भुवनेश्वर का घर सरकारी माध्यमिक शाला के बगल में है। स्कूल के मैदान में कुछ बच्चे खेल रहे हैं और कुछ पढ़ रहे हैं। रामदासी दलित उदित कुमार, कक्षा 6 का विद्यार्थी है। वह गणित के कुछ प्रश्नों का जवाब आसानी से दे देता है। पर जब मैंने उससे पूछा कि क्या वह अंग्रेजी जानता है तो वह चुप हो गया। उसकी मां ललिता देवी बहुत परेशान हैं कि उनके मतदाता परिचयपत्र में उनका नाम शीला देवी लिखा हुआ है। वे शिकायत करती हैं कि स्कूल के अध्यापक बच्चों की कोई फिक्र नहीं करते।

गांववालों के अनुसार माध्यमिक शाला के अधिकांश शिक्षक उच्च व मध्यम जातियों के हैं। स्कूल में लगभग एक दर्जन अध्यापक हैं परंतु एक महिला, जो मुझे स्कूल के पास मिली, ने बताया कि ”शिक्षकों को इस बात की कतई फिक्र नहीं रहती कि बच्चे कक्षाओं में हैं या इधर-उधर घूम रहे हैं।’’ गांववाले कहते हैं कि विद्यार्थियों को मध्यान्ह भोजन मिलता है परंतु उनकी शिकायत है कि रसोईयों की नियुक्ति केवल मध्यम जातियों से होती है। दलितों को रसोईये के रूप में नियुक्त नहीं किया जाता क्योंकि गांव में अछूत प्रथा अब भी जिंदा है।

शिक्षकों के हाथों भेदभाव झेलने के बाद भी बड़ी संख्या में दलित विद्यार्थी स्कूल जाते हैं। विद्यार्थियों को भोजन और किताबें मुफ्त देने की सरकारी नीति का सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। ”बदलाव तो आ रहा है। अब बड़ी संख्या में दलित बच्चे स्कूल जाने लगे हैं।’’ राम कहते हैं। अपेक्षाकृत समृद्ध दलित अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं।

हमारे बगल में मृत्युंजय कुमार नाम का एक रविदासी दलित बैठा है, जो बैल्लारी (कर्नाटक) में काम करता था और अभी एक महीना पहले ही बाथे लौटा है। उसके और उदित के पिता की तरह, बड़ी संख्या में दलित, रोजगार की तलाश में शहर जाते हैं। ललिता देवी के पति भी किसी शहर में काम करते हैं परंतु उन्हें उसका नाम नहीं मालूम। ”अगर हम गांव में रहेंगे तो खाएंगे क्या?’’ वे पूछती हैं।

जल्दी ही बातचीत का रूख विधानसभा चुनाव की ओर मुड़ जाता है। मृत्युंजय की पसंद नीतीश कुमार हैं। नीतीश कुमार, लालू यादव और कांग्रेस के महागठबंधन ने अरवल विधानसभा क्षेत्र से आरजेडी के रवीन्द्र सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है। अरवल में मुकाबला त्रिकोणीय है-भाजपा उम्मीदवार चितरंजन कुमार, सीपीआई-एमएल के महानंद प्रसाद और आरजेडी के रवीन्द्र सिंह के बीच।

धीरे-धीरे यह उभरकर सामने आता है कि रविदास मुख्यत: नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन के साथ हैं जबकि पासवान, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के समर्थक हैं। राजवंशी और बैठा जैसी अन्य दलित उपजातियां किसी एक पार्टी को वोट नहीं देतीं।

मृत्युंजय की तरह, भुवनेश्वर राम भी महागठबंधन के समर्थक हैं। ”मुकाबला कमल (भाजपा का चुनाव चिन्ह) और लालटेन (आरजेडी का चुनाव चिन्ह) के बीच है और मैं तो लालटेन का बटन दबाऊंगा।’’ फिर मैं दूसरे दलित परिवारों से मिलने निकल पड़ता हूं ताकि उनकी राय जान सकूं। मृत्युंजय मेरे साथ है। ”हमें विकास चाहिए और नीतीश वह कर रहे हैं,’’ वह कहता है।

और सीपीआई-एमएल का क्या? एक समय वह इस क्षेत्र में बहुत शक्तिशाली थी और उसका दावा था कि वह सामंती सेनाओं और सामंती तत्वों के विरूद्ध दलितों के संघर्ष का नेतृत्व कर रही है। परंतु अब मृत्युंजय जैसे लोग ‘विकास’ चाहते है। कई दलित, आरजेडी को इसलिए अपना वोट देना चाहते हैं क्योंकि उनको लगता है कि आरजेडी ही भाजपा को हरा सकती है। ”अगर भाजपा जीतती है तो भूमिहार और राजपूत शेर बन जाएंगे’’ मृत्युंजय कहता है। फिर, वह सोन नदी के किनारे की ओर इशारा करता है जहां से 1 दिसंबर, 1997 को ऊंची जातियों के हथियारबंद गुंडे गांव में घुसे थे। उस कत्लेआम में मृत्युंजय के कुछ रिश्तेदार भी मारे गए थे।

जब हम सोन के किनारे की तरफ बढ़ रहे थे तब मृत्युंजय ने एक पक्के घर की ओर इशारा किया, जो रणवीर सेना का पहला निशाना बना था। उस समय वह कच्चा था। कुछ दूरी पर शहीद स्मारक है, जिसका उद्घाटन 6 जनवरी, 1998 को सीपीआई-एमएल के तत्कालीन महासचिव रामजतन शर्मा ने किया था। लाल रंग के इस स्मारक पर सभी 58 मृतकों के नाम उत्कीर्ण हैं।

हर साल एक दिसंबर को सीपीआई-एमएल द्वारा हत्याकांड के शिकार लोगों की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। उसी दिन स्मारक पर लगे लाल झंडे को बदला जाता है, भजन गाए जाते हैं और प्रसाद बंटता है। स्मारक के पास हमारी मुलाकात साहेब शरण से हुई, जो अधेड़ावस्था का रविदासी और सीपीआईएमएल का समर्थक है। ”यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोग केवल जाति और धर्म के नाम पर वोट देते हैं,’’ वह कहता है। ”शिक्षा की कमी के कारण गरीब-गुरबा अपने असली मित्रों और शत्रुओं के बीच अंतर नहीं कर पाते’’।

गरीबों को सही निर्णय न ले पाने का दोषी ठहराते हुए शरण कहता है कि सरकार और प्रशासन सबसे बड़े गुनाहगार हैं। ”बागड़ ही खेत को खा रही है, आग बुझाने वाले ही आग लगा रहे हैं,’’ वह एक भोजपुरी कहावत के जरिए कहता है।

हम बातचीत कर ही रहे थे कि मेरा ध्यान कुछ दूरी पर भाजपा की टोपी से खेल रहे कुछ बच्चों की तरफ गया। ये बच्चे विनोद पासवान के घर के अहाते में थे। शरण ने बताया कि विनोद, पुलिस विभाग में काम करता है। पासवान के घर के दरवाजे पर अनेक हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र बने हुए हैं। स्पष्ट है कि पासवानों का तेजी से हिन्दूकरण हो रहा है और रामविलास पासवान के साथ भाजपा के गठबंधन के कारण वे भाजपा के समर्थक बन गए हैं।

विनोद के घर से कोई पचास गज दूर एक दूसरे पासवान-लाल मोहन-की छोटी अंडों की दुकान है। मैं थका हुआ था और मुझे भूख भी लग रही थी। मैं दुकान में लगी एक बैंच पर बैठ गया और आमलेट का आर्डर दिया। ”तुम किसे वोट दोगे?’’ मैंने पूछा। ”फूल को,’’ उसने तपाक से उत्तर दिया।

धुधंलका छा रहा था। लक्ष्मणपुर बाथे की मेरी यात्रा से एक चीज साफ थी कि इस बार दलित वोट विभिन्न राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों में बटेंगे।

(First published in Forward Press)

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