क्रिकेट की पिच पर जारी नफ़रत का खेल

साम्प्रदायिक विमर्श की तासीर देखिए कि जब तक पाकिस्तान को आप बुरा भला न कहे तब तक आप “सच्चे” देशभक्त नहीं हो सकते हैं. अगर आप मुसलमान हैं तो पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आप को कुछ ज़्यादा ही तल्ख़ी का इज़हार करना होना.

भारत-पाकिस्तान फाइनल मैच के फ़ौरन बाद दर्जनों मुसलमानों के ऊपर मुक़दमें ठोक दिए गए और कितने को गिरफ़्तार कर जेल भी भेज दिया गया. अब तक कम से कम 17 लोगों के ख़िलाफ़ देशद्रोह (sedition) का चार्ज लगाया जा चुका है. मुसलमानों की धर-पकड़ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और केरल समेत कई प्रदेशों से हुई.

विडम्बना देखिए कि इन प्रदेशों में “लेफ्ट” और “राईट” दोनों विचारधाराओं की सरकारें हैं. इल्ज़ाम सब पर तक़रीबन एक जैसे ही थे कि उन्होंने पाकिस्तानी टीम की जीत का “जश्न” मनाया और न सिर्फ़ पटाखे छोड़े बल्कि इस्लाम और पाकिस्तान-हिमायती नारे भी बुलंद किए.

क्या यह ‘क्रैकडाउन’ राजनीती से प्रेरित नहीं है? जब अंग्रेज़ी के मशहूर अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ (जून 23, 2017) ने मध्य प्रदेश के बुरहानपुर केस के “शिकायतकर्ता” लक्ष्मण कोली से इस बारे में पूछा तब उसने साफ़ कहा कि यह सब उसने पुलिस के दबाव में किया था: “मैंने पुलिस को शिकायत नहीं की थी… मैंने [पाकिस्तान और इस्लाम समर्थक] कोई नारे नहीं सुने और ना ही मैंने पटाखे छोड़ने की शिकायत की थी. जब सोमवार को मैं पुलिस थाने गया था तब पुलिस ने मुझे गवाह बना दिया. मैं बयान देने के लिए तैयार हूं, मगर मेरा बयान सिर्फ़ अदालत में जज के सामने होगा. मुझे डर है कि पुलिस मुझे परेशान करेगी.”

मैच से पहले सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जमकर भड़ास निकाला गया. ज़ुबान और लहजा भी भड़काऊ था -“बाप [भारत] बेटे [पाकिस्तान] की औक़ात बता देगा.” क्या इस तरह की हरकत किस भी लोकतंत्र के लिए शोभनीय है? ‘क्या किसी टीम के खेल की तारीफ़ के लिए नागरिकों को ग़द्दार-ए-वतन कहना चाहिए? क्या आपने सुना है कि इंग्लैंड में बसे भारतीयों को कभी सचिन, धोनी या कोहली की बैटिंग पर पर ताली बजाने के लिए वहां की पुलिस ने कभी गिरफ्तार किया हो?

अब फाइनल मैच को ही ले लीजिए. जब भारत के शीर्ष बल्लेबाज़ जल्दी-जल्दी पवेलियन लौट रहे थे तो एक शख्स ने पूर्वी ज़ुबान में हमारी तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि “रमज़ान में हरवा दिए हो न इंडिया को.” रमज़ान का भारत की हार से क्या सम्बन्ध है?

असल में उसकी टिप्पणी मेरे साथ बैठे कुछ मुस्लिम दोस्तों के ऊपर था. मगर उसे क्या ख़बर कि वही पास बैठा बरेली का एक मुस्लिम साथी अभी भी भारत की जीत को लेकर आशावान था और अपने मोबाइल पर तब भी मैच देख रहा था जब कई समर्थकों ने भारत के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद टीवी-सेट बंद कर दिया.

इसी तरह की बेतुकी बात शारजाह टूर्नामेंट के दौरान सालों पहले सुनने को मिलती थी, जब कुछ तंग-नज़र लोग यह कहते थे कि भारत पाकिस्तान से मैच इसलिए हार जाता था क्योंकि यह मैच अक्सर जुमा के दिन आयोजित होता था. जुमा से भारत की हार का क्या रिश्ता है? उनको कौन समझाए कि जुमा के दिन मैच इसलिए आयोजित किया जाता था ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शक मैच देखने आयें और मोटी कमाई की जा सके.

इस तरह के प्रोपगंडा से 36 साल के ऑटो-रिक्शा ड्राईवर अबरार भी परेशान था. “अगर इंडिया फाइनल हार गई तो इसमें मुसलमानों का क्या क़सूर है?” अबरार की झल्लाहट न सिर्फ़ उनकी आवाज़ बल्कि गाड़ी के शीशे में दिख रहे चेहरे से भी साफ़ दिख रही थी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दादरी के निवासी अबरार दिल्ली में रोज़ाना ऑटो चलाते हैं और यह सब बातें मुझे उनकी गाड़ी में सवारी के दौरान कुछ दिन पहले सुनने को मिला.

अबरार ने आगे कहा कि “पाकिस्तान इसलिए जीता कि उसने मेहनत बहुत की थी. इस जीत में मुसलमान कहां से आ गये!”. हिन्दुस्तानी मुसलमानों को पाकिस्तान से जोड़ना फ़िरक़ापरस्त ताक़तों की पुरानी साज़िश रही है. 50 साल पहले हिंदुत्व के एक बड़े विचारक ने अपनी एक किताब में हिन्दुस्तानी मुसलमानों को पाकिस्तानी “एजेंट” तक कह डाला और उन्हें देश की सुरक्षा के लिए आंतरिक ख़तरा बताया.

साम्प्रदायिक विमर्श की तासीर देखिए कि जब तक पाकिस्तान को आप बुरा भला न कहे तब तक आप “सच्चे” देशभक्त नहीं हो सकते हैं. अगर आप मुसलमान हैं तो पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आप को कुछ ज़्यादा ही तल्ख़ी का इज़हार करना होना. इस विमर्श ने नई नस्ल के ज़ेहन और दिमाग़ तक को पूर्वाग्रह से ग्रसित कर दिया है.

कुछ महीने पहले जब मैं अपने गांव में बच्चों के साथ क्रिकेट खेल रहा था और एक बार मज़ाक़-मज़ाक़ में यूं ही बोल गया कि मैं पाकिस्तानी बॉलर हूं तो उनमें से एक बच्चे ने मेरी गेंद को बड़ी ज़ोर से मारा और और कहा “जा पाकिस्तानी गेंद उठा”.

इस बच्चे की हिकारत भरे लहजे ने मुझे झिंझोड़ दिया. इसी तरह एक दफ़ा मैं उनमें से कुछ बच्चों को पढ़ा रहा था और यूं ही पूछ डाला कि आप पढ़-लिख कर क्या बनना चाहेंगे तो एक का जवाब था- “सेना में भर्ती होना है” और “देश के दुश्मनों को मार गिराना है”. जब पूछा कि देश के “दुश्मन” कौन हैं तो उसने जवाब देने में थोड़ा भी वक़्त नहीं लगा- “पाकिस्तान”.

क्या पाकिस्तान हमारे मुल्क की सारी परेशानियों और समस्यायों के लिए ज़िम्मेदार है? क्या यह हकीक़त नहीं है कि जितने लोग भारत-पाकिस्तान युद्ध में नहीं मरे, उससे कहीं ज्यादा लोग ग़रीबी, भुखमरी और इलाज के अभाव की वजह से मौत का शिकार हुए हैं? भगवा कट्टरपंथी अपनी राजनीतिक सुविधा के चलते पाकिस्तान, मुसलमान और इस्लाम के खुले फ़र्क़ को मिटा देते हैं. उनको कौन समझाए कि दुनिया में पाकिस्तान समेत 50 से ज़्यादा मुस्लिम-बहुल देश हैं और उनमें समय-समय पर साझेदारी और विरोध दोनों देखने को मिलता है.

उसी तरह धर्म के बुनियाद पर पाकिस्तान से हिन्दुस्तानी मुसलमानों को जोड़ना भी ग़लत है. क्या यह सच नहीं है कि एक बड़ी तादाद में हिन्दुस्तानी मुसलमानों ने पाकिस्तान के क़याम का कड़ा विरोध किया था? क्या भारत की सबसे बड़ी धार्मिक और सामाजिक मुस्लिम संगठन में से एक जमियत-ए-उलेमा-ए-हिन्द ने जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग का विरोध नहीं किया और तहरीक-ए-आज़ादी में कांग्रेस का समर्थन नहीं किया था? मगर इन सारे पहलुओं पर जान बूझ कर पर्दापोशी की जा रही है, जिसके दूरगामी परिणाम देश के लोकतंत्र और सामाजिक सद्भाव के लिए नुक़सानदायक हों

(First published in TwoCircles.net)

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of

Related Post

सिनेमाघर में राष्ट्रगान : नफरत की राजनीति को बढ़ावा और असल मुद्दों से दूरी

पिछले महीने केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में पुलिस ने 12 लोगों को हिरासत में ले लिया. उनपर आरोप लगाया गया कि जब सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बज रहा था तो…
Read More